Friday, 23 October 2015

Kripa

Another amateur attempt at poetry....somehow it flowed in Hindi this time...

Its true that poetry flows. It comes to you. This came to me as I was just falling asleep contentedly one night last week. Hope you enjoy reading it.

कृपा की चादर ओढ़ के सोई मै 
दुनिया की सब फिक्र छोड के सोई मै

ज़िंदगी  का दस्तूर  है मेरे यार 
ऊपर-निचे हो बार बार ''

कभी ख़ुशी, कभी घम, कभी राग, कभी द्वेष 
हटा दो ये उलजने, ये विनाश रूपी क्लेश

विचलित मन को स्थीर करे गुरु ज्ञान
उन्होंने राह दिखाई है, सत्संग सेवा और ध्यान

बस वर्त्तमान का क्षण है सच्चा 
भूत बीत चुक्का और भविष्य है कच्चा

स्वीकार कर ले सब परिस्थिति और लोग 
वर्ना नकारात्मक विचार से भर जायेंगे शरीर में रोग 

लोग क्या कहेंगे इसकी परवाह ना कर  
खुद से सच्चा रहे येही धारणा धर 

जब सबके प्रति हो प्रेम और सदभाव 
मिट जाएंगे सारे मन मोटाव 

सारा ब्रहमांड सुंदरता से खिल उठेगा 
जब अंतर मन सुन्दर और शांत हो जाएगा

Love
Alpa
In the same breath - read this awesome book yesterday- 'Siddhartha' by Hermann Hesse. A must read for spiritual seekers as well as non-seekers.

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